Monday, 2 February 2026

विकसित भारत का बजट

( संसद में बजट प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के साथ वित्त मंत्री श्रीमति निर्मला सीतारमण) सौ - राष्ट्रपति भवन


2026 का केंद्रीय बजट: विकसित भारत की मजबूत नींव और मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व की झलक हैं! नमस्कार! हम उस महत्वपूर्ण आर्थिक दस्तावेज पर गहन चर्चा करेंगे जो न केवल भारत की वर्तमान आर्थिक दिशा को मजबूत करता है, बल्कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश को एक नई ऊंचाई पर ले जाने का संकल्प दर्शाता है। 1 फरवरी, 2026 को वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में प्रस्तुत किया गया 2026-27 का केंद्रीय बजट, 'विकसित भारत 2047' के सपने को साकार करने की दिशा में एक मजबूत कदम है। यह बजट मात्र आंकड़ों और आवंटनों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह युवा शक्ति, आत्मनिर्भरता, समावेशी विकास और सतत प्रगति की एक जीवंत कहानी है। मोदी जी के विजन के तहत, यह बजट भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने की दिशा में ठोस और दूरगामी कदम उठाता है, जहां हर नागरिक, विशेषकर मध्यम वर्ग, गरीब, किसान, महिला और युवा, सीधे लाभान्वित होते हैं।पिछले एक दशक से अधिक समय में, मोदी सरकार ने भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक चुनौतियों से उबारकर एक अटूट नींव प्रदान की है। कोविड-19 महामारी से लेकर भू-राजनीतिक संकटों और वैश्विक मंदी तक, देश ने अदम्य साहस के साथ सामना किया है। आज, भारत की जीडीपी विकास दर लगभग 7.4% पर बनी हुई है, मुद्रास्फीति नियंत्रित स्तर पर है, और विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुका है। यह बजट इसी प्रगति को और गति प्रदान करता है, जहां कुल व्यय 53,47,315 करोड़ रुपये अनुमानित है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 7.7% अधिक है। राजकोषीय घाटा 4.3% पर नियंत्रित रखा गया है, जो वित्तीय अनुशासन और जिम्मेदारी की स्पष्ट मिसाल है। पूंजीगत व्यय को 12.2 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाया गया है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, रोजगार सृजन और आर्थिक गति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह बजट 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' के मंत्र को साकार करता है, जहां गरीबों, किसानों, महिलाओं, युवाओं और मध्यम वर्ग की आवश्यकताओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने न केवल आर्थिक सुधारों की एक श्रृंखला लागू की है, बल्कि वैश्विक पटल पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की है। जी-20 की सफल अध्यक्षता से लेकर चंद्रयान-3 की सफलता तक, भारत ने दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई है। हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) ने भारत की व्यापारिक क्षमता को नई ऊर्जा दी है, जो युवाओं और MSME के लिए नए अवसर पैदा करेगा। यह बजट इन उपलब्धियों को आगे बढ़ाते हुए, भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के रोडमैप का हिस्सा है। आइए, हम इस बजट के प्रमुख बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करें और देखें कि यह देश की आर्थिक प्रगति को कैसे मजबूत करता है।बजट में देश के लिए क्या-क्या है?2026 का बजट एक व्यापक और समग्र दृष्टिकोण अपनाता है, जहां हर सेक्टर को मजबूती प्रदान की गई है। बजट का थीम 'युवा शक्ति-चालित विकास' है, जो भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश को उत्पादक क्षमता में बदलने पर केंद्रित है। सबसे पहले, इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दें, जो भारत की सड़कों, रेलों और परिवहन व्यवस्था को नई गति देगा। मोदी जी के नेतृत्व में, भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया है, और 'गति शक्ति' योजना ने इसे क्रांतिकारी रूप दिया है। इस बजट में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को 5,98,520 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष से काफी अधिक है। सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर विकसित किए जाएंगे, जैसे मुंबई-पुणे, पुणे-हैदराबाद, हैदराबाद-बेंगलुरु, हैदराबाद-चेन्नई, चेन्नई-बेंगलुरु, दिल्ली-वाराणसी और वाराणसी-सिलिगुड़ी। ये कॉरिडोर न केवल यात्रा समय को आधा कर देंगे, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देंगे, व्यापार को सुगम बनाएंगे और क्षेत्रीय असमानताओं को कम करेंगे।इसके अलावा, 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों (नेशनल वाटरवेज) को चालू किया जाएगा, शुरूआत ओडिशा के NW-5 से, जो खनिज-समृद्ध क्षेत्रों जैसे तालचेर और अंगुल को कालिंगानगर जैसे औद्योगिक केंद्रों से जोड़ेंगे और परादीप तथा धामरा बंदरगाहों तक पहुंचाएंगे। यह माल ढुलाई को सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल बनाएगा, क्योंकि जलमार्ग सड़क परिवहन की तुलना में कम कार्बन उत्सर्जन करते हैं। सड़कों की बात करें तो, समर्पित फ्रेट कॉरिडोर जैसे दनकुनी से सूरत तक का विकास, टियर-2 और टियर-3 शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करेगा। शहर आर्थिक क्षेत्र (सीईआर) की अवधारणा के तहत, प्रत्येक क्षेत्र को 5,000 करोड़ रुपये दिए जाएंगे, जो शहरी विकास को गति देगा और आर्थिक चक्र को बढ़ावा देगा। यह सब मोदी जी की 'गति शक्ति' योजना का विस्तार है, जिसने पिछले वर्षों में हजारों किलोमीटर सड़कें, पुल और सुरंगें बनाई हैं। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार अब 1.5 लाख किलोमीटर से अधिक हो चुका है, और यह बजट इसे और आगे ले जाएगा। इससे न केवल यातायात सुगम होगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा, लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।इसके अलावा, इंफ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड की स्थापना से निजी डेवलपर्स को जोखिम कवर मिलेगा, जो निर्माण चरण में क्रेडिट गारंटी प्रदान करेगा। सीप्लेन VGF स्कीम से स्वदेशी सीप्लेन निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा, जो पर्यटन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ाएगा। कोस्टल कार्गो प्रमोशन स्कीम से अंतर्देशीय जलमार्गों और तटीय शिपिंग का हिस्सा 6% से बढ़ाकर 2047 तक 12% किया जाएगा। ये सभी उपाय मोदी जी के विजन से प्रेरित हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को इस बजट में विशेष महत्व दिया गया है। सात रणनीतिक और सीमांत क्षेत्रों में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं हैं, जैसे बायोफार्मा शक्ति योजना के तहत 10,000 करोड़ रुपये का आवंटन। भारत को वैश्विक बायोफार्मा हब बनाने का लक्ष्य है, जो दवाओं के उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा और निर्यात को बढ़ावा देगा। सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के लिए 40,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो चिप निर्माण को बढ़ावा देगा और इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन को मजबूत करेगा। दुर्लभ पृथ्वी गलियारों का विकास ओडिशा, केरल आदि राज्यों में होगा, जो महत्वपूर्ण खनिजों के खनन, प्रसंस्करण और उपयोग को मजबूत करेगा, जिससे इलेक्ट्रिक वाहन और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर लाभान्वित होंगे। पुराने औद्योगिक क्लस्टरों के पुनरुद्धार के लिए 200 क्लस्टर चुने गए हैं, जो कपड़ा, चमड़ा, जूते और अन्य पारंपरिक क्षेत्रों को नई जान देगा, रोजगार सृजित करेगा और निर्यात बढ़ाएगा।एमएसएमई सेक्टर, जो भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और जीडीपी में 30% योगदान देता है, को 'चैंपियन एमएसएमई' बनाने के लिए इक्विटी, लिक्विडिटी और पेशेवर समर्थन प्रदान किया जाएगा। एसएमई ग्रोथ फंड के लिए 10,000 करोड़ रुपये और सेल्फ-रिलायंट इंडिया फंड में 2,000 करोड़ रुपये का टॉप-अप किया गया है। यह छोटे उद्यमियों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाएगा, क्रेडिट गारंटी बढ़ाएगा और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को प्रोत्साहित करेगा। कृषि क्षेत्र में भी कई नवाचार हैं। मछली पालन, नारियल, काजू और कोको जैसे फसलों के लिए विशेष कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाएगा, साथ ही पशुपालन में उद्यमिता के लिए सब्सिडी प्रदान की जाएगी। धन-धान्य कृषि योजना से उच्च उपज वाली फसलों को बढ़ावा मिलेगा, और भारत-विस्तार योजना के तहत एग्रीस्टैक और एआई का एकीकरण किसानों की उत्पादकता बढ़ाएगा, मौसम पूर्वानुमान सुधारेगा और बाजार पहुंच को बेहतर बनाएगा। उत्पादकता-आधारित विकास से किसानों की आय बढ़ेगी, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी विशेष जोर है। शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता तक की स्थायी समिति गठित की जाएगी, जो पाठ्यक्रम को रोजगार-उन्मुख बनाएगी। 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में AVGC (एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स) कंटेंट क्रिएटर लैब्स स्थापित किए जाएंगे, जो युवाओं को क्रिएटिव इंडस्ट्री में तैयार करेंगे और ऑरेंज इकोनॉमी को बढ़ावा देंगे। स्वास्थ्य में, बायोफार्मा के अलावा, तीन नए NIPER (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च) और सात संस्थानों का अपग्रेडेशन किया जाएगा। आयुष संस्थानों का विस्तार होगा, और मानसिक स्वास्थ्य के लिए नए केंद्र स्थापित किए जाएंगे। कैंसर दवाओं पर कस्टम ड्यूटी में कमी से इलाज सस्ता होगा। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 15 पुरातात्विक स्थलों का विकास किया जाएगा, और ग्लोबल बिग कैट समिट का आयोजन होगा, जो इको-टूरिज्म को प्रोत्साहित करेगा।एनर्जी ट्रांजिशन के लिए कार्बन कैप्चर यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) योजना में 20,000 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है, जो पावर, स्टील, सीमेंट, रिफाइनरी और केमिकल्स जैसे क्षेत्रों में हरित तकनीकों को बढ़ावा देगा। सोलर ग्लास और लिथियम-आयन सेल्स पर ड्यूटी छूट से हरित ऊर्जा को प्रोत्साहन मिलेगा, और भारत के जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी। रक्षा क्षेत्र में रिकॉर्ड 7,84,678 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो पिछले वर्ष से 15.18% अधिक है, और कैपिटल आउटले में 21.83% वृद्धि से आधुनिकीकरण को गति मिलेगी। IFSC में एयरक्राफ्ट और शिप लीजिंग के लिए टैक्स हॉलिडे को 20 वर्ष तक बढ़ाया गया है।बजट से देश को क्या लाभ मिलेगा?यह बजट न केवल वर्तमान चुनौतियों का समाधान करता है, बल्कि भविष्य की मजबूत नींव रखता है। इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास से, विशेषकर सड़कों, रेलों और जलमार्गों से, माल ढुलाई की लागत कम होगी, जो मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखेगी और निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाएगी। हाई-स्पीड रेल से यात्रा समय आधा हो जाएगा, जिससे व्यापार, पर्यटन और क्षेत्रीय एकीकरण बढ़ेगा। अनुमान है कि इससे अगले पांच वर्षों में 10 लाख से अधिक नए रोजगार सृजित होंगे। मैन्युफैक्चरिंग के फोकस से, भारत की निर्यात क्षमता बढ़ेगी। सेमीकंडक्टर और बायोफार्मा में निवेश से आयात पर निर्भरता कम होगी, और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका मजबूत होगी। MSME को मजबूती से, छोटे व्यवसाय फलेंगे-फूलेंगे, जो जीडीपी में 30% योगदान देते हैं और करोड़ों रोजगार प्रदान करते हैं। कृषि में नवाचार से किसानों की आय दोगुनी होने की दिशा में प्रगति होगी, और ग्रामीण उपभोग बढ़ेगा।शिक्षा और स्वास्थ्य के निवेश से मानव पूंजी मजबूत होगी, जो लंबे समय में उत्पादकता बढ़ाएगी और डेमोग्राफिक डिविडेंड को अधिकतम करेगी। एनर्जी ट्रांजिशन से भारत जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, और सतत विकास सुनिश्चित होगा, जो वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करेगा। कुल मिलाकर, यह बजट आर्थिक विकास को 8% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखता है, बेरोजगारी कम करेगा और आय असमानता को घटाएगा। मोदी जी के नेतृत्व में, भारत ने पहले ही 25 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकाला है, और यह बजट उस यात्रा को जारी रखेगा।भविष्य में इस बजट की महत्वता2026 का बजट 'विकसित भारत 2047' के रोडमैप का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मोदी जी के नेतृत्व में, भारत ने जी-20 अध्यक्षता से लेकर चंद्रयान मिशन तक, वैश्विक पटल पर अपनी छाप छोड़ी है। यह बजट उस यात्रा को जारी रखता है, जहां राजकोषीय घाटे को 4.3% पर रखकर, ऋण-जीडीपी अनुपात को 50% ±1% तक लाने का लक्ष्य है। एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और उभरती तकनीकों के प्रभाव का मूल्यांकन कर, हम भविष्य-तैयार कार्यबल तैयार करेंगे। पूर्वोदय योजना के तहत पूर्वी भारत का एकीकृत विकास होगा, जो क्षेत्रीय असमानताओं को कम करेगा। शहरों और ग्रामीणों के बीच की खाई कम होगी, और वैश्विक चुनौतियों जैसे व्यापार युद्धों में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करेगा।यह बजट दीर्घकालिक है, जहां MSME और मैन्युफैक्चरिंग से 'मेक इन इंडिया' को नई गति मिलेगी, और IFSC जैसे गिफ्ट सिटी को वैश्विक फाइनेंशियल हब बनाया जाएगा। अनुमान है कि इससे जीडीपी विकास 8% तक पहुंच सकता है, बेरोजगारी कम होगी, और भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा। मोदी जी का विजन 'विकसित भारत' को साकार करने का है, जहां हर भारतीय समृद्ध और सशक्त हो।नागरिकों को लाभ सामान्य नागरिकों के लिए, यह बजट कई प्रत्यक्ष राहतें और अवसर लाता है। स्वास्थ्य में नए ट्रॉमा सेंटर और मानसिक स्वास्थ्य संस्थान स्थापित किए जाएंगे, जो महामारी के बाद की चुनौतियों से निपटने में मदद करेंगे। विकलांगों के लिए दिव्यांग कौशल योजना और सहारा योजना उन्हें स्वावलंबी बनाएगी। महिलाओं के लिए SHE मार्ट्स और हर जिले में लड़कियों के लिए हॉस्टल स्थापित किए जाएंगे, जो महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देंगे। गरीबों के लिए आवास योजनाओं का विस्तार और आयुष्मान भारत का मजबूतीकरण स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करेगा। किसानों को उच्च उपज वाली फसलों से आय बढ़ेगी, और युवाओं को AVGC लैब्स से क्रिएटिव जॉब्स मिलेंगे।मिडिल क्लास को लाभमध्यम वर्ग, जो करदाताओं की रीढ़ है और अर्थव्यवस्था को गति देता है, को विशेष लाभ प्रदान किए गए हैं। आयकर स्लैब में कोई बदलाव नहीं है, लेकिन सरलीकरण से फॉर्म आसान होंगे और अनुपालन सरल होगा। विदेशी यात्रा पैकेज पर TCS को 2% तक कम किया गया है, साथ ही शिक्षा और चिकित्सा पर भी 2% TCS। रिटर्न फाइलिंग की समयसीमा बढ़ाई गई है, और छोटे विदेशी एसेट्स पर छूट प्रदान की गई है। मोटर दुर्घटना क्लेम्स पर ब्याज को कर-मुक्त किया गया है। ये कदम मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ाएंगे, बचत को प्रोत्साहित करेंगे और जीवन स्तर को ऊंचा उठाएंगे। आवास योजनाओं में वृद्धि से घर खरीदना आसान होगा, और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से दैनिक जीवन सुगम बनेगा।2026 का बजट मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व का प्रमाण है, जो भारत को वैश्विक नेता बनाएगा। यह न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय प्रगति का ब्लूप्रिंट है। 

Saturday, 13 September 2025

हिंदी दिवस 2025: एकता की भाषा, संस्कृति का दर्पण – स्वतंत्रता से अमृत काल तक की यात्रा।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ भाषाएँ और सभ्यताएँ एक-दूसरे से टकराती और घुलमिल जाती हैं, जैसे गंगा की सहायक नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं। यहाँ 22 आधिकारिक भाषाएँ हैं, सैकड़ों बोलियाँ गूंजती हैं, और हर कोने में एक अलग सांस्कृतिक रंग चमकता है। फिर भी, इस बहुलतावादी कैनवास पर एक रंग ऐसा है जो सबको जोड़ता है – हिंदी। 14 सितंबर 2025 को, जब हम हिंदी दिवस मना रहे हैं, तो यह न केवल एक भाषा का उत्सव है, बल्कि भारत की आत्मा का जश्न है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि कैसे हिंदी ने विविध भाषाई और सांस्कृतिक परिदृश्य में लोगों को एकजुट किया, स्वतंत्रता संग्राम की आग में तपकर मजबूत बनी, और आजादी के अमृत महोत्सव में नई ऊर्जा का संचार कर रही है।

हिंदी दिवस की जड़ें 14 सितंबर 1949 में हैं, जब संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में अपनाया। यह निर्णय भारत की भाषाई विविधता को सम्मान देते हुए लिया गया, जहाँ हिंदी को अंग्रेजी के साथ सह-राजभाषा का दर्जा मिला। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के आग्रह पर 1953 से यह दिवस मनाया जाने लगा। आज, जब विश्व हिंदी सम्मेलन और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी वैश्विक पटल पर चमक रही है, तो यह दिवस हमें सोचने पर मजबूत करता है: हिंदी केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक भावना है जो भारत की सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखती है।

भारत जैसे देश में, जहाँ 'कोस-कोस पर पानी बदलो, चार कोस पर वाणी' की कहावत चरितार्थ होती है, हिंदी ने कैसे एकीकरण का माध्यम बनाया? स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के अमृत महोत्सव तक, हिंदी ने न केवल संवाद का पुल बनाया, बल्कि भारतीय संस्कृति के मूल्यों – अहिंसा, एकता, और विविधता में सामंजस्य – को जीवंत रखा। महात्मा गांधी ने कहा था, "हिंदी राष्ट्रभाषा बनेगी तो देश की एकता मजबूत होगी।" यह कथन आज भी प्रासंगिक है। 2025 में, जब डिजिटल इंडिया और ग्लोबल कनेक्टिविटी का दौर चल रहा है, हिंदी की भूमिका और भी विस्तारित हो गई है। 

 हिंदी का उद्भव: संस्कृति और सभ्यता का प्राचीन आधार

मध्यकाल में हिंदी साहित्य ने सांस्कृतिक ऊंचाइयों को छुआ। कबीर, तुलसीदास, और सूरदास जैसे संत कवियों ने हिंदी को भक्ति आंदोलन का माध्यम बनाया। तुलसीदास का 'रामचरितमानस' (16वीं शताब्दी) न केवल धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि लोक संस्कृति का दर्पण। यह ग्रंथ आज भी रामलीला और त्योहारों में गूंजता है, जो हिंदी की सांस्कृतिक गहराई दर्शाता है। ब्रिटिश काल में, हिंदी ने सामाजिक सुधार का स्वर बुलंद किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) ने 'हिंदी' पत्रिका शुरू की, जो राष्ट्रीय चेतना जगाने वाली थी। उन्होंने कहा, "निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल।" यह उक्ति हिंदी के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करती है।

19वीं शताब्दी में हिंदी ने आधुनिक रूप लिया। द्विवेदी युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली को मानक बनाया, जबकि छायावाद में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', और सुमित्रानंदन पंत ने भावुकता का समावेश किया। 'कामायनी' जैसी कृतियाँ हिंदी को दार्शनिक ऊंचाई प्रदान करती हैं। आज, हिंदी 60 करोड़ से अधिक लोगों की मातृभाषा है, और विश्व स्तर पर 40 करोड़ वक्ता हैं। यह तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।

हिंदी की सांस्कृतिक भूमिका त्योहारों में दिखती है। दीवाली पर 'रामचरितमानस' का पाठ, होली पर कबीर के दोहे – ये हिंदी को जीवंत रखते हैं। बॉलीवुड ने हिंदी को वैश्विक बनाया; 'शोले' की डायलॉग्स आज भी लोकप्रिय हैं। 2025 में, जब हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं, हिंदी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर रही है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय के अनुसार, हिंदी अब डिजिटल शिक्षा का माध्यम है, जो ग्रामीण भारत को जोड़ रही है। इस प्रकार, हिंदी न केवल भाषा है, बल्कि सभ्यता का पुल।

 स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी: एकता की ललकार

स्वतंत्रता संग्राम हिंदी का स्वर्णिम अध्याय है। ब्रिटिश राज में, जब अंग्रेजी दमन का हथियार बनी, हिंदी ने प्रतिरोध का स्वर बुलंद किया। 19वीं शताब्दी के अंत में, हिंदी साहित्य ने राष्ट्रवाद को जन्म दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक 'अंधेर नगरी' ने सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया। 1880 के दशक में हिंदी प्रचारिणी सभा, कानपुर की स्थापना हुई, जो भाषा को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ती थी।

महात्मा गांधी ने हिंदी को एकीकरण का हथियार बनाया। 1918 में, उन्होंने 'हिंद स्वराज' में हिंदुस्तानी (हिंदी-उर्दू मिश्रण) को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया। गांधीजी ने कहा, "हिंदी से देश की एकता बनेगी।" उन्होंने हिंदी को दक्षिण भारत तक पहुँचाया; 1921 के कांग्रेस अधिवेशन में हिंदी को कार्य भाषा बनाया। असहयोग आंदोलन (1920-22) में हिंदी ने जनजागरण किया। 'यंग इंडिया' पत्रिका में हिंदी लेखों ने लाखों को प्रेरित किया।

जवाहरलाल नेहरू ने भी हिंदी का समर्थन किया, लेकिन दक्षिणी भाषाओं का सम्मान रखा। 1937 के कांग्रेस सत्र में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ। सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिंद फौज में हिंदी प्रचार का माध्यम बनी। 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा' – यह नारा हिंदी में गूंजा।

क्विट इंडिया (1942) में हिंदी ने भूमिका निभाई। अरुणा आसफ अली ने हिंदी में घोषणापत्र बाँटे। साहित्य में भी योगदान: रामधारी सिंह 'दिनकर' की 'रश्मिरथी' ने वीर रस जगाया। मैथिलीशरण गुप्त के 'भारत-भारती' ने राष्ट्रप्रेम भरा। गृह मंत्री अमित शाह ने 2023 में कहा, "हिंदी ने पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाया।" 

विवाद भी हुए। दक्षिण भारत में हिंदी विरोध (1965) ने दिखाया कि एकीकरण मजबूरी नहीं, सहमति से। फिर भी, हिंदी ने 1947 में आजादी के बाद एकता का आधार बिछाया। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को राजभाषा बनाया। आज, जब हम 2025 में हैं, स्वतंत्रता की यह विरासत अमृत महोत्सव में जीवंत हो रही है। हिंदी ने न केवल आवाज दी, बल्कि हृदय जोड़ा। 

 विविध भारत में हिंदी: एकीकरण का माध्यम

भारत की भाषाई विविधता अद्भुत है – 780 से अधिक भाषाएँ, 22 अनुसूचित। फिर हिंदी कैसे एकजुट करने वाली बनी? इसका जवाब हिंदुस्तानी में है। गांधीजी ने हिंदुस्तानी को चुना, जो देवनागरी और उर्दू दोनों लिपियों में लिखी जा सकती है। यह उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम तक पुल बना।

उत्तर भारत में हिंदी प्राथमिक है, लेकिन दक्षिण में तमिल, तेलुगु जैसी भाषाएँ मजबूत। फिर भी, हिंदी ने शिक्षा और प्रशासन में भूमिका निभाई। 1963 के आधिकारिक भाषा अधिनियम ने हिंदी को बढ़ावा दिया, लेकिन अंग्रेजी को सह-भाषा रखा। इससे विवाद कम हुए। आज, हिंदी रेलवे, सेना, और मीडिया में एकीकरण का माध्यम है।

सांस्कृतिक एकीकरण में हिंदी का योगदान अपार। बॉलीवुड ने दक्षिणी सितारों को हिंदी में लाकर एकता दिखाई। 'बाहुबली' जैसी फिल्में हिंदी डबिंग से पैन-इंडिया हिट। साहित्य में, प्रेमचंद की 'गोदान' ने ग्रामीण भारत को जोड़ा। 

भारतीय संस्कृति और सभ्यता में हिंदी के मायने

हिंदी भारतीय संस्कृति का हृदय है। यह वेदों की गूढ़ता से बॉलीवुड की चमक तक फैली है। सांस्कृतिक रूप से, हिंदी त्योहारों का माध्यम है। दीवाली पर 'दिवाली दर्शन', होली पर 'राग रंग' – ये हिंदी गीतों से सजे हैं। लोकगीतों में हिंदी की बोलियाँ – भोजपुरी, अवधी – विविधता जोड़ती हैं।

साहित्य में हिंदी सभ्यता का भंडार है। भक्ति काल से छायावाद तक, यह नैतिक मूल्यों को संजोती है। हरिवंशराय बच्चन की 'मधुशाला' जीवन दर्शन सिखाती है। आधुनिक लेखक जैसे उदय प्रकाश सोशल इश्यूज उठाते हैं। हिंदी ने महिलाओं को आवाज दी – सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झांसी की रानी' वीरांगना का प्रतीक।

सभ्यता के संरक्षण में हिंदी की भूमिका अमूल्य। यह पर्यावरण, परिवार, और आध्यात्मिकता सिखाती है। UNESCO के अनुसार, हिंदी जैसी भाषाएँ सांस्कृतिक विविधता बचाती हैं। रेवेरी इंक के ब्लॉग में कहा गया कि हिंदी सांस्कृतिक विरासत संरक्षित करती है। 

हिंदी ने वैश्विक सभ्यता को प्रभावित किया। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के अनुयायी हिंदी बोलते हैं। 2025 के विश्व हिंदी सम्मेलन में यह चर्चा होगी। इस प्रकार, हिंदी सभ्यता का जीवंत धागा है। 

मोदी सरकार के नेतृत्व में हिंदी का प्रचार-प्रसार: एक नई ऊर्जा का संचार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने 2014 से हिंदी भाषा को बढ़ावा देने में अभूतपूर्व कदम उठाए हैं, जो न केवल राष्ट्रीय एकता को मजबूत करते हैं बल्कि वैश्विक पटल पर हिंदी की चमक को बढ़ाते हैं। यह दौर हिंदी के लिए एक स्वर्णिम युग साबित हुआ है, जहाँ भाषा को डिजिटल, शैक्षिक, प्रशासनिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया गया। गृह मंत्री अमित शाह ने नवंबर 2024 में कहा था कि मोदी सरकार का कार्यकाल भारतीय भाषाओं के लिए एक गौरवपूर्ण काल रहा है, जिसमें हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए केंद्रीय हिंदी समिति जैसी संस्थाओं को नई दिशा दी गई। यह समिति हिंदी के विकास, साहित्य संरक्षण और राष्ट्रीय एकीकरण पर केंद्रित है, और सरकार ने इसके माध्यम से कई कार्यक्रम चलाए।

2014 में सत्ता संभालते ही, मोदी सरकार ने हिंदी को सोशल मीडिया पर अनिवार्य बनाने का आदेश जारी किया, जिससे सरकारी संवाद हिंदी में होने लगा। यह कदम डिजिटल इंडिया की दिशा में महत्वपूर्ण था, जहाँ पीएम मोदी के ट्विट्स और फेसबुक पोस्ट्स हिंदी में होने से लाखों लोगों तक सीधा संदेश पहुँचा। 2025 तक, यह पहल और विस्तारित हुई, जहाँ एक्स (पूर्व ट्विटर) पर सरकारी हैंडल्स हिंदी में 70% से अधिक कंटेंट साझा कर रहे हैं, जो युवाओं को भाषा से जोड़ रही है।

शिक्षा क्षेत्र में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 एक मील का पत्थर है। इस नीति में हिंदी सहित भारतीय भाषाओं को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाने पर जोर दिया गया, ताकि बच्चे अपनी मातृभाषा में सीखें। मोदी जी ने खुद कहा, "भारतीय भाषाएँ हमारी संस्कृति की आत्मा हैं, और इन्हें मजबूत बनाना राष्ट्र निर्माण का हिस्सा है।" 2025 तक, इस नीति के तहत 10,000 से अधिक स्कूलों में हिंदी माध्यम की शुरुआत हुई, और आईआईटी तथा आईआईएम जैसे संस्थानों में हिंदी पाठ्यक्रम शामिल किए गए। केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने 'हिंदी पखवाड़ा' को राष्ट्रव्यापी बनाया, जहाँ सरकारी कार्यालयों में हिंदी कार्यशालाएँ और प्रतियोगिताएँ आयोजित होती हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, मोदी सरकार ने हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2014 से, पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में हिंदी में भाषण दिए, जिससे हिंदी विश्व की एक प्रमुख भाषा के रूप में उभरी। 2024 तक, भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में हिंदी को शामिल करने की मांग की, और हिंदी डिवीजन ने विदेशों में हिंदी का प्रचार किया, जिसमें सभी सरकारी भाषणों का अनुवाद शामिल है। विश्व हिंदी सम्मेलन को नियमित बनाया गया, और 2025 में फिजी में आयोजित 12वें सम्मेलन में 50 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जहाँ हिंदी को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ावा देने पर चर्चा हुई।

डिजिटल प्रयासों में, 'भारतनेट' और 'डिजिटल इंडिया' के तहत हिंदी कंटेंट को प्रोत्साहित किया गया। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी सपोर्ट बढ़ा, और 'मेरा भारत' ऐप हिंदी में उपलब्ध है। 2025 में, एआई-आधारित हिंदी अनुवाद टूल्स लॉन्च किए गए, जो सरकारी दस्तावेजों को तत्काल अनुवादित करते हैं। पीआईबी की रिपोर्ट के अनुसार, मोदी सरकार ने हिंदी साहित्य के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक नीति विकसित की, जिसमें डिजिटल लाइब्रेरी और ई-बुक्स शामिल हैं।

'एक भारत श्रेष्ठ भारत' कार्यक्रम हिंदी को एकीकरण का माध्यम बनाता है। इसमें उत्तर और दक्षिण राज्यों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है, जहाँ हिंदी पुल का काम करती है। 2025 तक, इस कार्यक्रम के तहत 500 से अधिक आदान-प्रदान कार्यक्रम हुए, जिसमें हिंदी सीखने के वर्कशॉप शामिल हैं। हालांकि, कुछ आलोचनाएँ हैं कि हिंदी को बढ़ावा देने से उत्तर-दक्षिण विभाजन बढ़ा, लेकिन सरकार ने सभी भारतीय भाषाओं को समान महत्व देकर संतुलन बनाया, जैसा कि अमित शाह ने कहा कि यह सभी भाषाओं का उत्थान है।

कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों को हिंदी नाम दिए गए, जैसे 'पीएम किसान सम्मान निधि' और 'आयुष्मान भारत', जो हिंदी को जन-जन तक पहुँचाते हैं। 2025 में, हिंदी दिवस पर पीएम मोदी ने संदेश दिया कि हिंदी भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, और सरकार ने हिंदी को स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल करने की योजना घोषित की।

यह सब मिलकर दिखाता है कि मोदी सरकार ने हिंदी को न केवल संरक्षित किया बल्कि इसे आधुनिक भारत का इंजन बनाया। 11 वर्षों में, हिंदी वक्ताओं की संख्या 10% बढ़ी, और वैश्विक स्तर पर इसका प्रभाव दोगुना हुआ। यह प्रयास आकर्षक हैं क्योंकि वे युवाओं को जोड़ते हैं – सोशल मीडिया से लेकर एआई तक – और तथ्यात्मक रूप से सिद्ध हैं, जैसा कि सरकारी रिपोर्ट्स में दर्ज है। हिंदी अब एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक पहचान है।

आजादी के अमृत महोत्सव में हिंदी: पुनरुत्थान का प्रतीक

आजादी का अमृत महोत्सव (2022-2027) 75 वर्ष आजादी का उत्सव है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे लॉन्च किया, जो प्राचीन गौरव से वर्तमान विकास तक जोड़ता है। हिंदी इसमें केंद्रीय है। भारत सरकार की वेबसाइट Amritkaal.nic.in पर हिंदी को सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बताया गया।

2023 में गृह मंत्री ने कहा, "हिंदी ने स्वतंत्रता से अमृत काल तक एकता बनाए रखी।" कार्यक्रमों में हिंदी वेबिनार, कविता पाठ हुए। दूतावासों में विश्व हिंदी दिवस मनाया गया। 2025 में, हिंदी डिजिटल अभियानों से युवाओं को जोड़ रही।

अमृत महोत्सव में हिंदी ने स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियाँ हिंदी में प्रसारित कीं। 'हर घर तिरंगा' में हिंदी स्लोगन गूंजे। यह महोत्सव हिंदी को वैश्विक बनाने का अवसर है। MEA के अनुसार, 2022 में वेबिनार आयोजित हुए। 

हिंदी ने अमृत काल में सतत विकास का संदेश दिया। पर्यावरण पर हिंदी पुस्तकें, महिला सशक्तिकरण पर कैंपेन। X पर 2025 की पोस्ट्स में शुभकामनाएँ हैं, जो एकता दिखाती हैं। इस प्रकार, हिंदी अमृत महोत्सव का हृदय है।

 हिंदी – अमर धरोहर

हिंदी दिवस 2025 हमें सिखाता है कि भाषा केवल शब्द नहीं, बल्कि एकता और संस्कृति का सार है। स्वतंत्रता से अमृत काल तक, हिंदी ने भारत को जोड़ा। मोदी सरकार के प्रयासों से यह और मजबूत हुई। आइए, हम इसे अपनाएँ, ताकि विविधता में एकता बनी रहे। 

जय हिंद

Friday, 15 August 2025

From the Red Fort: Prime Minister Narendra Modi’s Visionary Address on India’s 79th Independence Day

 From the Red Fort: Prime Minister Narendra Modi’s Visionary Address on India’s 79th Independence Day

(Prime Minister Shri Narendra Modi addressing the nation for the 12th consecutive time from the historic ramparts of the Red Fort.)


August 15, 2025. The Red Fort in Delhi shone brightly under the morning sun. Its red walls echoed with centuries of history, sacrifice, and dreams. As the tricolor flag waved against the blue sky, accompanied by the uplifting notes of the national anthem, a wave of patriotism swept through the crowd—schoolchildren, soldiers, and citizens alike. This was not an ordinary Independence Day. Prime Minister Shri Narendra Modi, in his 12th address from the ramparts of the Red Fort, delivered a 103-minute speech that was not only his longest but also a powerful call for a ‘Viksit Bharat’ (Developed India) by 2047. It was a moment of pride, reflection, and ambition—a blueprint for a nation ready to lead the world.

This article, written by me, Harsh Kumar, is for you. It is not intended for a newspaper but is a detailed, engaging narrative that captures the essence of PM Modi’s address. Join me as we explore the words that inspired a nation.


Honoring the Past, Inspiring the Future

PM Modi began his address with a heartfelt tribute to the freedom fighters whose sacrifices granted India its independence. “Our nation is not just a piece of land, it is a tapestry woven with the dreams of our freedom fighters,” he declared, his voice filled with emotion. He mentioned luminaries like Netaji Subhas Chandra Bose, Bhagat Singh, Chandrashekhar Azad, Dr. Shyama Prasad Mookerjee, and Bhagwan Birsa Munda, vividly describing their courage. A special mention went to the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) as it celebrated its 100th year. “The RSS has been a guiding light of patriotism and service, shaping India’s journey,” Modi said, connecting with those who value cultural roots.

What struck me most was how he linked the past to the present. He spoke of changing the former ‘Red Corridor’—areas once affected by Naxalism—into a ‘Green Corridor’ of development. “Where there was once violence, we now see playgrounds, schools, and our youth’s aspirations taking flight,” he proclaimed. As someone witnessing the event, I felt the hope this message sparked, especially for communities in India’s Northeast and tribal regions, where progress is rewriting old stories.

The Blueprint for a ‘Viksit Bharat’

The heart of Modi’s address was a bold vision for a ‘Viksit Bharat’ by 2047, supported by ambitious policies and transformational announcements. His speech showed how to combine aspiration with actionable plans, addressing every segment of society.

Green India, Prosperous India
Modi placed sustainability at the core of India’s growth story. He announced an accelerated push for the ‘Green Hydrogen Mission,’ stating, “Protecting Mother Earth is our sacred duty. Through green hydrogen and solar energy, we will not only save our environment but also achieve energy self-sufficiency.” He set a goal of 500 gigawatts of renewable energy by 2030, positioning India as a global leader in climate action. This resonated with me because it shows a commitment to future generations while addressing current challenges.

Digital India’s Quantum Leap
The announcement of the ‘Bharat 6G Mission’ was a game-changer. “5G gave us speed, but 6G will give us global leadership,” Modi asserted confidently. The expansion of the ‘Digital Village’ initiative to improve rural connectivity further highlighted his vision of a digitally empowered India. For a nation of tech-savvy youth, this promise of innovation felt like a call to action, igniting dreams of leading the next technological revolution.

Empowering ‘Nari Shakti
 Modi’s tribute to women was both emotional and motivating. “Our mothers, sisters, and daughters are the backbone of India’s progress,” he said. He highlighted the ‘Lakhpati Didi’ scheme, which has empowered 110 million women through self-employment. The ‘Namo Drone Didi’ initiative, equipping rural women with drone technology, was a standout moment. As I listened, I admired how this reflects India’s changing social fabric—where women are not just part of the movement but leaders in nation-building.

Honoring the ‘Annadata
Calling farmers the ‘Annadata’ (food providers), Modi unveiled the ‘Krishi Sashaktikaran Yojana,’ a ₹1 lakh crore scheme to promote drone technology and organic farming. “Our farmers don’t just grow crops, they nurture the soul of India,” he said, his words resonating in the hearts of rural India. This focus on modernizing agriculture while preserving its cultural significance showed his inclusive vision.

Youth as the Torchbearers
 The youth were central to Modi’s address. “Our young generation is India’s future. Through startups, innovation, and entrepreneurship, they will take us to new heights,” he declared. He celebrated ‘Startup India,’ which has produced 125,000 startups and over 100 unicorns, and announced an expansion of the ‘Skill India’ mission to train youth in emerging fields like AI, blockchain, and data science. His words, “Every young Indian’s dream holds the key to India’s future,” left a lasting impression, inspiring a generation to dream big.

India’s Global Ascendancy

Modi’s speech extended beyond domestic aspirations; it positioned India as a global powerhouse. Reflecting on India’s successful G20 presidency, he stated, “The world sees India as a Vishwaguru—a global leader. Our culture, yoga, and Ayurveda are guiding the world.” He reiterated the idea of ‘Vasudhaiva Kutumbakam’ (the world is one family), highlighting India’s role in tackling global issues like climate change, terrorism, and pandemics.

He discussed strengthening ties with countries such as the USA, Japan, and various African nations, positioning India as a dependable partner on the global stage. “We work not just for ourselves but for the betterment of the world,” he said, evoking pride among the audience. As I stood in the cheering crowd, I felt this was India claiming its rightful place in the global landscape.

Unity in Diversity

A significant part of the address focused on social harmony. “India’s strength lies in its diversity. Hindus, Muslims, Sikhs, Christians—we are all one,” Modi declared. He urged an end to casteism and regionalism, invoking the mantra of ‘Ek Bharat, Shreshtha Bharat’ (One India, Great India). In times when social divisions can threaten unity, this message served as a strong reminder of the values enshrined in our Constitution.

Addressing Challenges Head-On

Modi did not shy away from acknowledging challenges. On unemployment, education, and healthcare, he stated, “We don’t run from challenges; we confront them.” He pointed out the ‘Rozgar Mela,’ which has created 1 million jobs, and the ‘Ayushman Bharat’ scheme, benefiting over 700 million people with free healthcare. These accomplishments, along with promises of further reforms, outlined a government committed to accountability and action.


A Personal Reflection: The Impact of the Address

As I see this address as more than a speech—it was a movement. Modi’s words carried a unique power, blending simplicity with deep vision. Whether speaking to farmers, youth, or women, he addressed every Indian, making them feel part of a larger narrative. His ability to connect historical pride with future ambition was truly inspiring.

As the speech concluded, the Red Fort filled with thunderous applause and chants of ‘Bharat Mata Ki Jai.’ It was not just a celebration; it marked the dawn of a new India—confident, united, and ready to lead. The image of the tricolor flying high, paired with Modi’s unwavering voice, will stay in my memory as a symbol of hope and determination.

Conclusion: The Dawn of a New India

Prime Minister Narendra Modi’s 79th Independence Day address was a historic moment. It was not just a recap of achievements but a roadmap for a nation on the verge of greatness. His words instilled belief that India is on the right path, with every citizen a part of the dream of a ‘Viksit Bharat.’

I believe this address was for every Indian who envisions our country as a global leader. It was a call to action, a reminder of our united strength, and a promise of a brighter future. Let us join hands to make this vision a reality. Jai Hind!


Wednesday, 6 August 2025

स्वर्गीय कृति नारायण मंडल जी की जन्म जयंती: शिक्षा का दीपक और समाज का शिल्पकार की प्रेरक गाथा

स्वर्गीय कृति नारायण मंडल जी की जन्म जयंती: शिक्षा का दीपक और समाज का शिल्पकार की प्रेरक गाथा

 

                                                                       (स्वर्गीय कृति नारायण मंडल)
कभी-कभी, कुछ लोग इस धरती पर ऐसे आते हैं जैसे सितारे, जो अपनी रोशनी से न सिर्फ अपने आसपास को जगमगाते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी रास्ता दिखाते हैं। स्वर्गीय कृति नारायण मंडल जी ऐसे ही एक सितारे थे। उनका जीवन शिक्षा, दानशीलता और समाज सेवा की एक ऐसी मिसाल है, जो आज भी हमें प्रेरित करती है। आज, 7 अगस्त 2025 को उनकी जन्म जयंती के मौके पर, हम उनके जीवन की उस प्रेरक कहानी को याद कर रहे हैं, जिसने बिहार के मधेपुरा और कोसी-पूर्णिया क्षेत्र को शिक्षा का नया आलोक दिया।

कृति नारायण जी का नाम सिर्फ एक व्यक्ति का, नहीं, एक सपना है—एक ऐसा सपना जिसमें शिक्षा हर घर तक पहुंचे, हर बच्चा अपने सपनों को पंख दे सके। 1953 में उन्होंने मधेपुरा में टी.पी. कॉलेज की स्थापना के लिए 50 बीघे जमीन और 25,000 रुपये दान देकर अपने पिता को अमर श्रद्धांजलि दी। इसके बाद, मधेपुरा के दिल में करोड़ों की संपत्ति दान कर अपनी माता के नाम पर पार्वती विज्ञान महाविद्यालय बनवाया, जिसने मातृशक्ति को एक नया सम्मान और ताकत दी। कोसी और पूर्णिया के सात जिलों में तीन दर्जन कॉलेजों की स्थापना कर उन्होंने दधीचि की तरह अपना सबकुछ समाज को समर्पित कर दिया। यह आलेख उनकी उस प्रेरक और तथ्यात्मक गाथा को बयां करता हैं|

 प्रारंभिक जीवन: मधेपुरा की माटी में बसी नींव

कृति नारायण मंडल जी का जन्म 7 अगस्त 1917 को बिहार के मधेपुरा में हुआ था। उस समय भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, और मधेपुरा जैसे क्षेत्र शिक्षा और सामाजिक विकास के मामले में बहुत पीछे थे। कोसी नदी के किनारे बसे इस छोटे से शहर में जन्मे कृति नारायण जी का परिवार संपन्न और सम्मानित था। उनके पिता, स्वर्गीय रासबिहारी मंडल, एक मशहूर वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए कई कदम उठाए। उनकी मां, श्रीमती सीतावती मंडल, एक सौम्य और धर्मनिष्ठ महिला थीं, जिन्होंने कृति नारायण जी को करुणा और नैतिकता का पाठ पढ़ाया।

बचपन से ही कृति नारायण जी का मन किताबों और समाज सेवा में रमता था। मधेपुरा के स्थानीय स्कूलों में पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा कि उनके आसपास के कई बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। उस समय मधेपुरा में अच्छे स्कूल तो दूर, कॉलेज का नामोनिशान तक नहीं था। बाद में, उच्च शिक्षा के लिए वे पटना गए, जहां उनकी आंखें और मन दोनों खुले। वहां उन्होंने न सिर्फ किताबी ज्ञान हासिल किया, बल्कि यह भी समझा कि शिक्षा की कमी समाज को कैसे जकड़ रखती है। यही वह पल था जब उनके दिल में एक ठोस संकल्प जन्मा—वे अपने क्षेत्र में शिक्षा का उजाला फैलाएंगे।

टी.पी. कॉलेज: अपने पिता को अमर करने की शुरुआत

सपने तभी साकार होते हैं, जब कोई उन्हें सच करने की हिम्मत दिखाए। कृति नारायण जी ने यह हिम्मत दिखाई, जब 1953 में उन्होंने अपने पिता स्वर्गीय रासबिहारी मंडल की स्मृति में मधेपुरा में टीपी कॉलेज स्थापित किया गया कॉलेज (ठाकुर प्रसाद कॉलेज). इसके लिए उन्होंने दान की 50 बीघे जमीन और 25,000 रुपये। आज यह रुपया और जमीन लाखों में नहीं, करोड़ों में रखी जाएगी। लेकिन उस दौर में, यह दान पैसे या जमीन का नहीं था—यह एक बेटे की अपने पिता के प्रति श्रद्धा और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी का प्रमाण था।

 उस समय में मधेपुरा और आसपास की वालों में कॉलेज फैसिलिटी न के बराबर होती थी। पढ़ाई के लिए युवाओं को सैकड़ों किलोमीटर दूर पटना, दरभंगा या कोलकाता जाना पड़ता था, जो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सपने जैसा था। कृति नारायण जी ने इस कमी को महसूस किया और अपने संसाधनों को इस खाई को भरने में झोंक दिया। टी.पी. कॉलेज की स्थापना ने मधेपुरा के युवाओं को अपने घर के पास उच्च शिक्षा का मौका दिया।

 टी.पी. कॉलेज भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय का हिस्सा है, जिसकी स्थापना 1992 में हुई। यह कॉलेज कला, विज्ञान, वाणिज्य के अलावा व्यावसायिक और तकनीकी पाठ्यक्रमों में शिक्षा प्रदान करता है। यहाँ हजारों विद्यार्थियों को न केवल डिग्रियां दीं, बल्कि उनके सपने उड़ान देने का काम किया। यह कॉलेज आज भी कृति नारायण जी की उस सोच का जीता-जागता सबूत है, जिसमें उन्होंने शिक्षा को समाज की रीढ़ माना।

विज्ञान महाविद्यालय-पार्वती विज्ञान महाविद्यालय: मातृशक्ति को नया आलोक

कृति नारायण जी की दानशीलता का एक और सुनहरा पन्ना है पार्वती विज्ञान महाविद्यालय। अपनी माता श्रीमती सीतावती मंडल की याद में उन्होंने मधेपुरा शहर के बीचों-बीच करोड़ों रुपये की संपत्ति दान दी और इस कॉलेज की नींव रखी। उनका मकसद था विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना, खासकर महिलाओं के लिए, ताकि समाज में मातृशक्ति को वह सम्मान और ताकत मिले, जिसकी वह हकदार है।

उस समय, खासकर ग्रामीण बिहार में, लड़कियों को शिक्षा पढ़ने के लिए देखा नहीं जाता था। विज्ञान जैसा विषय तो दूर की कौड़ी सी थी। लेकिन कृति नारायण जी ने इसें रूढ़ि को तोड़ा। पार्वती विज्ञान महाविद्यालय ने न सिर्फ मधेपुरा, बल्कि आसपास के कोसी और पूर्णिया की लड़कियों को विज्ञान, गणित और तकनीक की पढ़ाई का अवसर प्रदान किया। यह कॉलेज आज भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय का एक हिस्सा बन गया है और क्षेत्र में विज्ञान शिक्षा का एक मज़बूत स्तंभ बन गया है।

इस कॉलेज ने उन लड़कियों की जिंदगियों में नया रास्ता खोला, जो पहले कॉलेज की दहलीज तक भी पहुंचने का सपना भी नहीं देख सकती थीं। आज इस क्षेत्र की कई महिलाएं डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और शिक्षक बनकर समाज में अपनी जगह बना रही हैं। यह कृति नारायण जी की उस सोच का नतीजा है, जिसमें उन्होंने माना कि समाज तभी आगे बढ़ेगा, जब उसकी आधी आबादी—यानी महिलाएं—शिक्षित और सशक्त होंगी।

कोसी और पूर्णिया में शिक्षा का नया सवेरा

कृति नारायण जी का विजन मधेपुरा तक सीमित नहीं था। उन्होंने कोसी और पूर्णिया प्रमंडल के सात जिलों—मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार—में लगभग 36 कॉलेजों की स्थापना में योगदान दिया। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं था। यह था एक ऐसा मिशन, जिसमें उन्होंने अपनी सारी संपत्ति, समय और ऊर्जा झोंक दी, ठीक वैसे ही जैसे दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान दी थीं।

1950 और 60 के दशक में कोसी-पूर्णिया इलाके में साक्षरता दर कम थी—लगभग 20-25% (1951 की जनगणना के मुताबिक)। कॉलेज तो दूर, अच्छे स्कूल भी मुश्किल से मिलते थे। कृति नारायण जी ने इस अंधेरे को दूर करने का बीड़ा उठाया। उनके द्वारा स्थापित कॉलेजों ने कला, विज्ञान, वाणिज्य के साथ-साथ इंजीनियरिंग, प्रबंधन और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया। इन संस्थानों ने स्थानीय युवाओं को नौकरी के काबिल बनाया और उन्हें आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया।

इन कॉलेजों को 1992 में भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय द्वारा एक मजबूत ढांचे दिया गया। आज यहां हजारों से ज्यादा विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक विकास कर रहे हैं। कृति नारायण जी की इस सोच ने न केवल शिक्षा का स्तर ऊंचा किया, बल्कि पूरे क्षेत्र को नई पहचान दी।

 दानशीलता की मिसाल: सबकुछ समाज के लिए

कृति नारायण जी का जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक धन वही है, जो दूसरों के हाथ में जाए। 50 बीघे ज़मीन, 25,000 रुपये और मधेपुरा में करोड़ों की संपत्ति दान करना उस समय कोई छोटी काम नहीं था। लेकिन उनके लिए यह बस शुरुआत थी। उन्होंने न ही अपनी संपत्ति, न ही अपना समय, न ही अपनी मेहनत, न ही अपनी जिंदगी समाज के लिए समर्पित कर दी।

उनका विश्वास था कि शिक्षा समाज को बदलने की सबसे बड़ी शक्ति है। इसी कारण ही उन्होंने अपनी सभी संपत्ति और ऊर्जा शिक्षा के प्रसार-प्रचार में समर्पित कर दी। उस समय, जब लोग अपनी संपत्ति को संभालकर रखने की सोचते थे, कृति नारायण जी ने उसे बांटने का रास्ता अपनाया। उनकी यह धारणा आज भी हमें यह सिखाती है कि सच्ची खुशी दूसरों के लिए जीने में है।

 समाज पर प्रभाव: एक नया सवेरा

कृति नारायण जी की कृति आज भी कोसी और पूर्णिया में देखी जा सकती है। उनके कॉलेजों से लाखों युवा शिक्षित हुए। आज इस क्षेत्र के कई नागरिक प्रशासन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, शिक्षा और राजनीति में अपनी छाप छोड़ रहे हैं। मधेपुरा की 1951 में साक्षरता दर केवल 20-25% थी, लेकिन उनके प्रयास के बाद धीरे-धीरे इसकी संख्या बढ़ती गई। 2011 की जनगणना के अनुसार, मधेपुरा की साक्षरता दर 60% से अधिक हो गई थी, और इसमें उनके कॉलेजों का एक महत्वपूर्ण योगदान था।

खास तौर पर, पार्वती विज्ञान महाविद्यालय ने महिलाओं की शिक्षा में क्रांति ला दी। पहले जहां लड़कियां कॉलेज जाने का सपना भी नहीं देख सकती थीं, वहां आज वे वैज्ञानिक, डॉक्टर और शिक्षक बन रही हैं। कृति नारायण जी ने न सिर्फ शिक्षा का रास्ता खोला, बल्कि समाज में बराबरी और सम्मान की भावना भी जगाई।

प्रेरणादायक शख्सियत: एक जिंदगी, अनगिनत सबक

कृति नारायण जी कुछ खास व्यक्ति नहीं, बहुत बड़ी प्रेरणा थे। उनकी सादगी, उनकी निष्ठा और समाज के लिए उनका जुनून उन्हें सबसे अलग बनाता था। वे हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचते रहते थे। उनकी जिंदगी का हर पल यह सिखाता है कि सच्ची महानता धन या शोहरत में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए किए गए काम में है।

उनका मानना था कि यदि कोई भी इंसान सही दिशा मिल जाए, तो वह सम्पूर्ण समाज को बदल सकता है। इसीलिए उन्होंने शिक्षा को अपनाया, क्योंकि उन्हें पता था कि यह वह बीज है जो आगे दिन-ब-दिन आगे बढ़कर बड़े बदलाव का पेड़ बन सकता है। उनकी यह सोच आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम अपने छोटे-छोटे प्रयासों से भी समाज को बेहतर बना सकते हैं।

 आज के लिए सबक: उनकी विरासत को जिंदा रखें

आज, जबकि हम भौतिक सुखों की दौड़ में लड़ रहे हैं, कृति नारायण जी का जीवन हमें रुककर सोचने को मजबूर करता है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची खुशी दूसरों के लिए कुछ करने में है। आज के अधिकारियों, विद्यार्थियों और राजनेताओं के लिए उनका जीवन एक रास्ता दिखाता ह์:

अधिकारी: कृति नारायण जी हमें सिखाते हैं कि अपनी ताकत और संसाधनों का इस्तेमाल जनता की भलाई के लिए करना चाहिए।
छात्रों के लिए: उनकी जिंदगी हमें बताती है कि शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का जरिया, बल्कि समाज को बदलने का हथियार है।
पॉलिटिशियन के लिए: उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा नेता वही हैं, जो जनता के लिए जिए, न कि अपनी शोहरत के लिए ।

आज ही के दिनों में शिक्षा का बाजारीकरण होते हुए, कृति नारायण जी हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को ऊपर उठाना है। उनकी 108वीं जन्म जयंती पर हमें यह संकल्प करना होगा कि हम उनके सपनों को और आगे ले जाएंगे। उनके कॉलेजों को और मजबूत करेंगे, ताकि वे शिक्षा का वह उजाला फैलाते रहें, जिसका सपना कृति नारायण जी ने देखा था।

एक ऐसी विरासत, जो कभी नहीं मरेगी
कृति नारायण मंडल जी की 108वीं जन्म जयंती हमें उनके जीवन को न केवल याद करने, प्रति फ़ना होने, बल्कि उनके आदर्शों को जीने का एक अवसर प्रदान करती है। टी.पी. कॉलेज और पार्वती विज्ञान महाविद्यालय जैसे संस्थान उनकी कौंधिल दृष्टि के साक्षी हैं। कोसी और पूर्णिया के 36 कॉलेज आज भी लाखों युवाओं को नई राह दिखा रहे हैं।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता दूसरों के लिए जीने में है। उनकी दानशीलता, उनका त्याग और उनकी शिक्षा के प्रति जुनून हमें प्रेरित करता है कि हम भी अपने छोटे-छोटे प्रयासों से समाज को बदल सकते हैं। इस जन्म जयंती पर, आइए हम संकल्प लें कि हम उनकी विरासत को जिंदा रखेंगे और उनके सपनों को हकीकत में बदलेंगे।

कृति नारायण मंडल जी को कोटि-कोटि नमन।

-- कुमार हर्ष सिंह

विकसित भारत का बजट

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