(स्वर्गीय कृति नारायण मंडल)
कभी-कभी, कुछ लोग इस धरती पर ऐसे आते हैं जैसे सितारे, जो अपनी रोशनी से न सिर्फ अपने आसपास को जगमगाते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी रास्ता दिखाते हैं। स्वर्गीय कृति नारायण मंडल जी ऐसे ही एक सितारे थे। उनका जीवन शिक्षा, दानशीलता और समाज सेवा की एक ऐसी मिसाल है, जो आज भी हमें प्रेरित करती है। आज, 7 अगस्त 2025 को उनकी जन्म जयंती के मौके पर, हम उनके जीवन की उस प्रेरक कहानी को याद कर रहे हैं, जिसने बिहार के मधेपुरा और कोसी-पूर्णिया क्षेत्र को शिक्षा का नया आलोक दिया।
कृति नारायण जी का नाम सिर्फ एक व्यक्ति का, नहीं, एक सपना है—एक ऐसा सपना जिसमें शिक्षा हर घर तक पहुंचे, हर बच्चा अपने सपनों को पंख दे सके। 1953 में उन्होंने मधेपुरा में टी.पी. कॉलेज की स्थापना के लिए 50 बीघे जमीन और 25,000 रुपये दान देकर अपने पिता को अमर श्रद्धांजलि दी। इसके बाद, मधेपुरा के दिल में करोड़ों की संपत्ति दान कर अपनी माता के नाम पर पार्वती विज्ञान महाविद्यालय बनवाया, जिसने मातृशक्ति को एक नया सम्मान और ताकत दी। कोसी और पूर्णिया के सात जिलों में तीन दर्जन कॉलेजों की स्थापना कर उन्होंने दधीचि की तरह अपना सबकुछ समाज को समर्पित कर दिया। यह आलेख उनकी उस प्रेरक और तथ्यात्मक गाथा को बयां करता हैं|
प्रारंभिक जीवन: मधेपुरा की माटी में बसी नींव
कृति नारायण मंडल जी का जन्म 7 अगस्त 1917 को बिहार के मधेपुरा में हुआ था। उस समय भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, और मधेपुरा जैसे क्षेत्र शिक्षा और सामाजिक विकास के मामले में बहुत पीछे थे। कोसी नदी के किनारे बसे इस छोटे से शहर में जन्मे कृति नारायण जी का परिवार संपन्न और सम्मानित था। उनके पिता, स्वर्गीय रासबिहारी मंडल, एक मशहूर वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए कई कदम उठाए। उनकी मां, श्रीमती सीतावती मंडल, एक सौम्य और धर्मनिष्ठ महिला थीं, जिन्होंने कृति नारायण जी को करुणा और नैतिकता का पाठ पढ़ाया।
बचपन से ही कृति नारायण जी का मन किताबों और समाज सेवा में रमता था। मधेपुरा के स्थानीय स्कूलों में पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा कि उनके आसपास के कई बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। उस समय मधेपुरा में अच्छे स्कूल तो दूर, कॉलेज का नामोनिशान तक नहीं था। बाद में, उच्च शिक्षा के लिए वे पटना गए, जहां उनकी आंखें और मन दोनों खुले। वहां उन्होंने न सिर्फ किताबी ज्ञान हासिल किया, बल्कि यह भी समझा कि शिक्षा की कमी समाज को कैसे जकड़ रखती है। यही वह पल था जब उनके दिल में एक ठोस संकल्प जन्मा—वे अपने क्षेत्र में शिक्षा का उजाला फैलाएंगे।
टी.पी. कॉलेज: अपने पिता को अमर करने की शुरुआत
सपने तभी साकार होते हैं, जब कोई उन्हें सच करने की हिम्मत दिखाए। कृति नारायण जी ने यह हिम्मत दिखाई, जब 1953 में उन्होंने अपने पिता स्वर्गीय रासबिहारी मंडल की स्मृति में मधेपुरा में टीपी कॉलेज स्थापित किया गया कॉलेज (ठाकुर प्रसाद कॉलेज). इसके लिए उन्होंने दान की 50 बीघे जमीन और 25,000 रुपये। आज यह रुपया और जमीन लाखों में नहीं, करोड़ों में रखी जाएगी। लेकिन उस दौर में, यह दान पैसे या जमीन का नहीं था—यह एक बेटे की अपने पिता के प्रति श्रद्धा और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी का प्रमाण था।
उस समय में मधेपुरा और आसपास की वालों में कॉलेज फैसिलिटी न के बराबर होती थी। पढ़ाई के लिए युवाओं को सैकड़ों किलोमीटर दूर पटना, दरभंगा या कोलकाता जाना पड़ता था, जो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सपने जैसा था। कृति नारायण जी ने इस कमी को महसूस किया और अपने संसाधनों को इस खाई को भरने में झोंक दिया। टी.पी. कॉलेज की स्थापना ने मधेपुरा के युवाओं को अपने घर के पास उच्च शिक्षा का मौका दिया।
टी.पी. कॉलेज भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय का हिस्सा है, जिसकी स्थापना 1992 में हुई। यह कॉलेज कला, विज्ञान, वाणिज्य के अलावा व्यावसायिक और तकनीकी पाठ्यक्रमों में शिक्षा प्रदान करता है। यहाँ हजारों विद्यार्थियों को न केवल डिग्रियां दीं, बल्कि उनके सपने उड़ान देने का काम किया। यह कॉलेज आज भी कृति नारायण जी की उस सोच का जीता-जागता सबूत है, जिसमें उन्होंने शिक्षा को समाज की रीढ़ माना।
विज्ञान महाविद्यालय-पार्वती विज्ञान महाविद्यालय: मातृशक्ति को नया आलोक
कृति नारायण जी की दानशीलता का एक और सुनहरा पन्ना है पार्वती विज्ञान महाविद्यालय। अपनी माता श्रीमती सीतावती मंडल की याद में उन्होंने मधेपुरा शहर के बीचों-बीच करोड़ों रुपये की संपत्ति दान दी और इस कॉलेज की नींव रखी। उनका मकसद था विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना, खासकर महिलाओं के लिए, ताकि समाज में मातृशक्ति को वह सम्मान और ताकत मिले, जिसकी वह हकदार है।
उस समय, खासकर ग्रामीण बिहार में, लड़कियों को शिक्षा पढ़ने के लिए देखा नहीं जाता था। विज्ञान जैसा विषय तो दूर की कौड़ी सी थी। लेकिन कृति नारायण जी ने इसें रूढ़ि को तोड़ा। पार्वती विज्ञान महाविद्यालय ने न सिर्फ मधेपुरा, बल्कि आसपास के कोसी और पूर्णिया की लड़कियों को विज्ञान, गणित और तकनीक की पढ़ाई का अवसर प्रदान किया। यह कॉलेज आज भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय का एक हिस्सा बन गया है और क्षेत्र में विज्ञान शिक्षा का एक मज़बूत स्तंभ बन गया है।
इस कॉलेज ने उन लड़कियों की जिंदगियों में नया रास्ता खोला, जो पहले कॉलेज की दहलीज तक भी पहुंचने का सपना भी नहीं देख सकती थीं। आज इस क्षेत्र की कई महिलाएं डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और शिक्षक बनकर समाज में अपनी जगह बना रही हैं। यह कृति नारायण जी की उस सोच का नतीजा है, जिसमें उन्होंने माना कि समाज तभी आगे बढ़ेगा, जब उसकी आधी आबादी—यानी महिलाएं—शिक्षित और सशक्त होंगी।
कोसी और पूर्णिया में शिक्षा का नया सवेरा
कृति नारायण जी का विजन मधेपुरा तक सीमित नहीं था। उन्होंने कोसी और पूर्णिया प्रमंडल के सात जिलों—मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार—में लगभग 36 कॉलेजों की स्थापना में योगदान दिया। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं था। यह था एक ऐसा मिशन, जिसमें उन्होंने अपनी सारी संपत्ति, समय और ऊर्जा झोंक दी, ठीक वैसे ही जैसे दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान दी थीं।
1950 और 60 के दशक में कोसी-पूर्णिया इलाके में साक्षरता दर कम थी—लगभग 20-25% (1951 की जनगणना के मुताबिक)। कॉलेज तो दूर, अच्छे स्कूल भी मुश्किल से मिलते थे। कृति नारायण जी ने इस अंधेरे को दूर करने का बीड़ा उठाया। उनके द्वारा स्थापित कॉलेजों ने कला, विज्ञान, वाणिज्य के साथ-साथ इंजीनियरिंग, प्रबंधन और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया। इन संस्थानों ने स्थानीय युवाओं को नौकरी के काबिल बनाया और उन्हें आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया।
इन कॉलेजों को 1992 में भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय द्वारा एक मजबूत ढांचे दिया गया। आज यहां हजारों से ज्यादा विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक विकास कर रहे हैं। कृति नारायण जी की इस सोच ने न केवल शिक्षा का स्तर ऊंचा किया, बल्कि पूरे क्षेत्र को नई पहचान दी।
दानशीलता की मिसाल: सबकुछ समाज के लिए
कृति नारायण जी का जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक धन वही है, जो दूसरों के हाथ में जाए। 50 बीघे ज़मीन, 25,000 रुपये और मधेपुरा में करोड़ों की संपत्ति दान करना उस समय कोई छोटी काम नहीं था। लेकिन उनके लिए यह बस शुरुआत थी। उन्होंने न ही अपनी संपत्ति, न ही अपना समय, न ही अपनी मेहनत, न ही अपनी जिंदगी समाज के लिए समर्पित कर दी।
उनका विश्वास था कि शिक्षा समाज को बदलने की सबसे बड़ी शक्ति है। इसी कारण ही उन्होंने अपनी सभी संपत्ति और ऊर्जा शिक्षा के प्रसार-प्रचार में समर्पित कर दी। उस समय, जब लोग अपनी संपत्ति को संभालकर रखने की सोचते थे, कृति नारायण जी ने उसे बांटने का रास्ता अपनाया। उनकी यह धारणा आज भी हमें यह सिखाती है कि सच्ची खुशी दूसरों के लिए जीने में है।
समाज पर प्रभाव: एक नया सवेरा
कृति नारायण जी की कृति आज भी कोसी और पूर्णिया में देखी जा सकती है। उनके कॉलेजों से लाखों युवा शिक्षित हुए। आज इस क्षेत्र के कई नागरिक प्रशासन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, शिक्षा और राजनीति में अपनी छाप छोड़ रहे हैं। मधेपुरा की 1951 में साक्षरता दर केवल 20-25% थी, लेकिन उनके प्रयास के बाद धीरे-धीरे इसकी संख्या बढ़ती गई। 2011 की जनगणना के अनुसार, मधेपुरा की साक्षरता दर 60% से अधिक हो गई थी, और इसमें उनके कॉलेजों का एक महत्वपूर्ण योगदान था।
खास तौर पर, पार्वती विज्ञान महाविद्यालय ने महिलाओं की शिक्षा में क्रांति ला दी। पहले जहां लड़कियां कॉलेज जाने का सपना भी नहीं देख सकती थीं, वहां आज वे वैज्ञानिक, डॉक्टर और शिक्षक बन रही हैं। कृति नारायण जी ने न सिर्फ शिक्षा का रास्ता खोला, बल्कि समाज में बराबरी और सम्मान की भावना भी जगाई।
प्रेरणादायक शख्सियत: एक जिंदगी, अनगिनत सबक
कृति नारायण जी कुछ खास व्यक्ति नहीं, बहुत बड़ी प्रेरणा थे। उनकी सादगी, उनकी निष्ठा और समाज के लिए उनका जुनून उन्हें सबसे अलग बनाता था। वे हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचते रहते थे। उनकी जिंदगी का हर पल यह सिखाता है कि सच्ची महानता धन या शोहरत में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए किए गए काम में है।
उनका मानना था कि यदि कोई भी इंसान सही दिशा मिल जाए, तो वह सम्पूर्ण समाज को बदल सकता है। इसीलिए उन्होंने शिक्षा को अपनाया, क्योंकि उन्हें पता था कि यह वह बीज है जो आगे दिन-ब-दिन आगे बढ़कर बड़े बदलाव का पेड़ बन सकता है। उनकी यह सोच आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम अपने छोटे-छोटे प्रयासों से भी समाज को बेहतर बना सकते हैं।
आज के लिए सबक: उनकी विरासत को जिंदा रखें
आज, जबकि हम भौतिक सुखों की दौड़ में लड़ रहे हैं, कृति नारायण जी का जीवन हमें रुककर सोचने को मजबूर करता है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची खुशी दूसरों के लिए कुछ करने में है। आज के अधिकारियों, विद्यार्थियों और राजनेताओं के लिए उनका जीवन एक रास्ता दिखाता ह์:
अधिकारी: कृति नारायण जी हमें सिखाते हैं कि अपनी ताकत और संसाधनों का इस्तेमाल जनता की भलाई के लिए करना चाहिए।
छात्रों के लिए: उनकी जिंदगी हमें बताती है कि शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का जरिया, बल्कि समाज को बदलने का हथियार है।
पॉलिटिशियन के लिए: उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा नेता वही हैं, जो जनता के लिए जिए, न कि अपनी शोहरत के लिए ।
आज ही के दिनों में शिक्षा का बाजारीकरण होते हुए, कृति नारायण जी हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को ऊपर उठाना है। उनकी 108वीं जन्म जयंती पर हमें यह संकल्प करना होगा कि हम उनके सपनों को और आगे ले जाएंगे। उनके कॉलेजों को और मजबूत करेंगे, ताकि वे शिक्षा का वह उजाला फैलाते रहें, जिसका सपना कृति नारायण जी ने देखा था।
एक ऐसी विरासत, जो कभी नहीं मरेगी
कृति नारायण मंडल जी की 108वीं जन्म जयंती हमें उनके जीवन को न केवल याद करने, प्रति फ़ना होने, बल्कि उनके आदर्शों को जीने का एक अवसर प्रदान करती है। टी.पी. कॉलेज और पार्वती विज्ञान महाविद्यालय जैसे संस्थान उनकी कौंधिल दृष्टि के साक्षी हैं। कोसी और पूर्णिया के 36 कॉलेज आज भी लाखों युवाओं को नई राह दिखा रहे हैं।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता दूसरों के लिए जीने में है। उनकी दानशीलता, उनका त्याग और उनकी शिक्षा के प्रति जुनून हमें प्रेरित करता है कि हम भी अपने छोटे-छोटे प्रयासों से समाज को बदल सकते हैं। इस जन्म जयंती पर, आइए हम संकल्प लें कि हम उनकी विरासत को जिंदा रखेंगे और उनके सपनों को हकीकत में बदलेंगे।
कृति नारायण मंडल जी को कोटि-कोटि नमन।
-- कुमार हर्ष सिंह
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