Tuesday, 20 May 2025

बिहार का पुनर्जनन: एनडीए की उपलब्धियाँ, मिथिलांचल की नई पहचान, और आरजेडी की उपेक्षा।



**बिहार का पुनर्जनन: एनडीए की उपलब्धियाँ, मिथिलांचल की नई पहचान, और आरजेडी की उपेक्षा**

     (बिहार - मानचित्र) Source- Google 
बिहार, जो कभी अविकसित बुनियादी ढांचे, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन, और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों से जूझ रहा था, आज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के नेतृत्व में विकास की नई ऊँचाइयों को छू रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने बिहार को एक समृद्ध, आत्मनिर्भर, और प्रगतिशील राज्य बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। विशेष रूप से मिथिलांचल क्षेत्र—मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, दरभंगा, और मधुबनी जैसे जिले—एनडीए की नीतियों के केंद्र में रहे हैं, जहाँ बुनियादी ढांचे, कृषि, स्वास्थ्य, और शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव देखे जा रहे हैं। इसके विपरीत, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के 1990 से 2005 तक के 15 साल के शासनकाल में मिथिलांचल की घोर उपेक्षा और नीतिगत कमियों ने क्षेत्र के विकास को दशकों पीछे धकेल दिया। यह विस्तृत आलेख एनडीए की उपलब्धियों को तथ्यों, आँकड़ों, और स्थानीय प्रभाव के साथ प्रस्तुत करता है, मिथिलांचल की विशिष्ट उपलब्धियों को रेखांकित करता है, और आरजेडी शासन की कमियों को रोचक ढंग से उजागर करता है।

**1. बुनियादी ढांचे में क्रांति: मिथिलांचल को जोड़ने की नई राह**  
एनडीए सरकार ने बिहार के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए अभूतपूर्व निवेश और योजना लागू की है। मिथिलांचल क्षेत्र में **कोसी रेल महासेतु** एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। 1.9 किलोमीटर लंबा यह रेल पुल, जिसे 2020 में 516 करोड़ रुपये की लागत से पूरा किया गया, सुपौल और मधेपुरा को रेल नेटवर्क से जोड़ता है। यह 86 साल पुरानी मीटर-गेज लाइन को ब्रॉड-गेज में बदलने का परिणाम है, जिसने मिथिलांचल के व्यापारियों, किसानों, और यात्रियों के लिए यात्रा समय को 50% तक कम किया और माल ढुलाई लागत में 30% की कमी लाई। उदाहरण के लिए, सुपौल से मुजफ्फरपुर तक माल परिवहन का समय पहले 12 घंटे था, जो अब 6 घंटे से कम हो गया है। इस परियोजना ने मिथिलांचल के स्थानीय बाजारों को राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ा, जिससे सुपौल और मधेपुरा के छोटे व्यापारियों को 20% तक अधिक मुनाफा होने लगा।  
इसके विपरीत, आरजेडी शासन (1990-2005) में कोसी क्षेत्र की रेल कनेक्टिविटी पूरी तरह उपेक्षित रही। 1997 में शुरू हुई कोसी रेल महासेतु परियोजना को आरजेडी सरकार ने 8 साल तक अधर में लटकाए रखा। इस दौरान मिथिलांचल के लोग पुरानी और असुविधाजनक रेल सेवाओं पर निर्भर रहे, जिसने क्षेत्र की आर्थिक प्रगति को बाधित किया।  
एक और महत्वपूर्ण कदम है **नमो भारत रैपिड रेल** (जयनगर-पटना), जिसका उद्घाटन अप्रैल 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने किया। 13,840 करोड़ रुपये की इस परियोजना ने मधेपुरा, सहरसा, और मधुबनी को पटना से जोड़कर यात्रा समय को 8 घंटे से घटाकर 5.5 घंटे कर दिया। यह रेल सेवा मिथिलांचल के छात्रों, नौकरीपेशा लोगों, और व्यापारियों के लिए वरदान साबित हुई है। उदाहरण के लिए, मधेपुरा के एक छात्र अब पटना के शैक्षणिक संस्थानों में दिन में पढ़ाई कर घर लौट सकता है, जो पहले असंभव था। आरजेडी शासन में ऐसी कोई आधुनिक रेल परियोजना शुरू नहीं हुई, और मिथिलांचल की कनेक्टिविटी राजधानी से कटकर रह गई थी।

**2. मखाना उद्योग: मिथिलांचल की वैश्विक पहचान**  
मिथिलांचल भारत के मखाना (फॉक्सनट) उत्पादन का 90% हिस्सा देता है, और एनडीए सरकार ने इस क्षेत्र को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। 2025 के केंद्रीय बजट में **मखाना बोर्ड** की स्थापना की घोषणा एक ऐतिहासिक निर्णय है। 100 करोड़ रुपये के प्रारंभिक निवेश के साथ, यह बोर्ड मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, दरभंगा, और मधुबनी के 10 लाख से अधिक मखाना किसानों को लाभ पहुँचाएगा। बोर्ड के तहत सुपौल में 20 करोड़ रुपये की लागत से बना भंडार गृह 2024 में शुरू हुआ, जिसने 5,000 किसानों को अपनी उपज को सुरक्षित रखने और बेहतर कीमत पाने में मदद की। मखाना निर्यात 2023 में 50 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2025 में 80 मिलियन डॉलर होने की उम्मीद है, जो अमेरिका, कनाडा, और यूएई जैसे देशों में बढ़ती माँग को दर्शाता है। इसके अलावा, मधेपुरा में 2025 में शुरू होने वाली मखाना प्रोसेसिंग यूनिट 2,000 स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सृजित करेगी।  
इसके उलट, आरजेडी शासन में मखाना उद्योग को कोई संगठित समर्थन नहीं मिला। 1990-2005 के दौरान मखाना किसानों के लिए न तो भंडारण सुविधाएँ विकसित की गईं और न ही निर्यात को बढ़ावा देने की कोई नीति बनी। नतीजतन, सहरसा और सुपौल के किसानों को अपनी उपज स्थानीय बिचौलियों को औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ी। उदाहरण के लिए, 2000 के दशक में मखाना किसानों को प्रति किलो 50-60 रुपये मिलते थे, जबकि आज एनडीए की नीतियों के कारण यह कीमत 150-200 रुपये तक पहुँच गई है। मखाना बोर्ड मिथिलांचल को “विश्व मखाना हब” बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

**3. स्वास्थ्य और शिक्षा: मिथिलांचल में नया सवेरा**  
एनडीए सरकार ने मिथिलांचल में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व निवेश किया है। **दरभंगा में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS)** इस दिशा में एक मील का पत्थर है। नवंबर 2024 में 1,361 करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुई इस परियोजना से मिथिलांचल के 2 करोड़ लोगों को विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलेंगी। 960 बेड वाला यह अस्पताल 2027 तक चालू हो जाएगा और 5,000 प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित करेगा। यह मिथिलांचल के लोगों के लिए न केवल बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ लाएगा, बल्कि मेडिकल पर्यटन को भी बढ़ावा देगा।  
सहरसा में **मेडिकल कॉलेज** की स्थापना एक और महत्वपूर्ण कदम है। 2024 में 21.27 एकड़ भूमि इसके लिए हस्तांतरित की गई, और 70 करोड़ रुपये के प्रारंभिक निवेश से यह कॉलेज 2026 तक शुरू होने की उम्मीद है। यह 500 बेड की स्वास्थ्य सुविधा और 100 सीटों वाला मेडिकल शिक्षा केंद्र प्रदान करेगा, जिससे मधेपुरा, सहरसा, और सुपौल के युवाओं को मेडिकल शिक्षा के अवसर मिलेंगे।  
आरजेडी शासन में मिथिलांचल की स्वास्थ्य सेवाएँ दयनीय थीं। 2005 तक सहरसा और सुपौल में कोई बड़ा सरकारी अस्पताल नहीं था, और मधेपुरा के जिला अस्पताल में केवल 50 बेड और 5 डॉक्टर थे। मेडिकल कॉलेज की स्थापना का कोई प्रयास नहीं हुआ, और बुनियादी उपकरणों की कमी के कारण मरीजों को पटना या दिल्ली जैसे शहरों में जाना पड़ता था। उदाहरण के लिए, 2000 के दशक में मधेपुरा में कोई एमआरआई मशीन नहीं थी, और गंभीर मरीजों को 200 किमी दूर पटना रेफर किया जाता था। एनडीए की ये परियोजनाएँ मिथिलांचल को स्वास्थ्य और शिक्षा का नया केंद्र बना रही हैं।

**4. कृषि और सिंचाई: मिथिलांचल की हरियाली को नया जीवन**  
मिथिलांचल का कोसी क्षेत्र बाढ़ और सूखे की दोहरी मार से लंबे समय तक प्रभावित रहा है। एनडीए सरकार ने **पश्चिमी कोसी नहर परियोजना** के माध्यम से इस समस्या का समाधान किया है। 2025 के केंद्रीय बजट में 5,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना से सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, और दरभंगा में 50,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को सालभर सिंचाई सुविधा मिलेगी। इससे 5 लाख किसानों की आय में 30% तक वृद्धि होने की उम्मीद है। उदाहरण के लिए, सुपौल के किसान रामचंद्र यादव ने बताया कि इस परियोजना से उनकी धान की फसल अब साल में दो बार हो रही है, जिसने उनकी आय को दोगुना कर दिया।  
आरजेडी शासन में कोसी क्षेत्र की सिंचाई परियोजनाएँ कागजों तक सीमित रहीं। पश्चिमी कोसी नहर परियोजना, जो 1980 के दशक में शुरू हुई थी, 2005 तक केवल 20% पूरी हुई थी। इस दौरान मिथिलांचल के किसानों को बाढ़ के बाद सूखे की स्थिति से जूझना पड़ा, और सहरसा में 60% कृषि भूमि सिंचाई के अभाव में बंजर रह गई। एनडीए की यह परियोजना मिथिलांचल को कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना रही है, और कोसी क्षेत्र अब बिहार का “धान का कटोरा” बनने की ओर अग्रसर है।

**5. सामाजिक और आर्थिक समावेशन: हर घर तक समृद्धि**  
एनडीए सरकार ने सामाजिक समावेशन को प्राथमिकता दी है। **प्रधानमंत्री आवास योजना** के तहत मिथिलांचल में सीतामढ़ी, सुपौल, और मधेपुरा में 80,000 परिवारों का सर्वेक्षण पूरा हो चुका है। 2025 तक 20,000 परिवारों को पक्के मकान देने का लक्ष्य है, जिसके लिए 800 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। मखाना उत्पादन से जुड़े 2 लाख परिवारों के लिए प्रशिक्षण और सूक्ष्म-वित्त योजनाएँ शुरू की गई हैं, जिससे सुपौल और मधेपुरा में 10,000 नए रोजगार सृजित हुए। उदाहरण के लिए, सुपौल की मखाना प्रोसेसिंग इकाइयों में 500 महिलाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार दिया गया है।  
आरजेडी शासन में सामाजिक योजनाएँ भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का शिकार रहीं। 2005 तक मिथिलांचल में आवास योजनाएँ नाममात्र की थीं, और सुपौल में केवल 5% ग्रामीण परिवारों को पक्के मकान मिले थे। मखाना किसानों के लिए कोई प्रशिक्षण या आर्थिक सहायता नहीं थी, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर रखा। एनडीए की योजनाएँ मिथिलांचल के हर घर तक समृद्धि पहुँचा रही हैं।

**6. सांस्कृतिक और राजनीतिक पुनर्जागरण**  
मिथिलांचल की समृद्ध मिथिला संस्कृति, जो मधुबनी पेंटिंग और मैथिली भाषा के लिए विश्व प्रसिद्ध है, को एनडीए ने नई पहचान दी है। **मखाना बोर्ड** और मिथिलांचल की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए 2025 में मधुबनी में अंतरराष्ट्रीय मिथिला महोत्सव शुरू किया गया, जिसमें 50,000 पर्यटक शामिल हुए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मिथिलांचल को “भारत की सांस्कृतिक धरोहर का गहना” करार दिया। 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में मधुबनी में प्रधानमंत्री मोदी की रैली (24 अप्रैल, 2025) ने मिथिलांचल को राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र में ला दिया।  
आरजेडी शासन में मिथिलांचल की सांस्कृतिक विरासत को कोई प्रोत्साहन नहीं मिला। मधुबनी पेंटिंग को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने या मैथिली भाषा को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं हुए। 2004 में मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग को आरजेडी ने नजरअंदाज किया, जबकि एनडीए के समर्थन से यह 2003 में ही संभव हो सका।  

**7. कानून-व्यवस्था और सामाजिक स्थिरता**  
एनडीए सरकार ने बिहार में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने में भी उल्लेखनीय काम किया है। मिथिलांचल में 2005 के बाद अपराध दर में 60% की कमी आई है, और सुपौल में नए पुलिस प्रशिक्षण केंद्र ने 1,000 स्थानीय युवाओं को रोजगार दिया है। इसके विपरीत, आरजेडी शासन को “जंगलराज” के रूप में जाना जाता था, जब मधेपुरा और सहरसा जैसे जिलों में अपहरण और रंगदारी आम थी। 2000 के दशक में मधेपुरा में प्रति माह 20 अपहरण की घटनाएँ दर्ज होती थीं, जो आज घटकर 2-3 प्रति माह हो गई हैं। एनडीए की यह उपलब्धि मिथिलांचल में सामाजिक स्थिरता और आर्थिक निवेश को बढ़ावा दे रही है।

निष्कर्ष: मिथिलांचल की नई उड़ान
एनडीए सरकार ने बिहार को विकास के पथ पर ले जाते हुए मिथिलांचल को एक नई पहचान दी है। कोसी रेल महासेतु, मखाना बोर्ड, दरभंगा में एम्स, पश्चिमी कोसी नहर परियोजना, और सामाजिक योजनाएँ मधेपुरा, सहरसा, और सुपौल को आर्थिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध कर रही हैं। इसके विपरीत, आरजेडी के 15 साल के शासन में नीतिगत उपेक्षा, भ्रष्टाचार, और अधूरी परियोजनाओं ने मिथिलांचल को विकास से वंचित रखा। आज, एनडीए की दूरदर्शी नीतियों ने मिथिलांचल को बिहार का गौरव बनाया है। यह क्षेत्र न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रहा है, जो समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विकास का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।

- कुमार हर्ष सिंह


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