Sunday, 25 May 2025

ऑपरेशन सिंदूर और कांग्रेस की भटकाने वाली राजनीति: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एकजुटता का आह्वान।

**ऑपरेशन सिंदूर और कांग्रेस की भटकाने वाली राजनीति: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एकजुटता का आह्वान**
- Kumar Harsh Singh.
(ऑपरेशन सिंदूर के सफल होने के पश्चात माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी वायु सेना के जवानों के साथ (सौजन्य - PIB) )


भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता हमारी एकता, गौरव और वैश्विक पहचान का आधार हैं। आज, जब भारत माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक सशक्त, आत्मनिर्भर और वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है, तब कुछ राजनीतिक ताकतें, विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी, अपनी संकीर्ण और भटकाने वाली राजनीति के जरिए देश की सुरक्षा और एकता को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों ने भारत की सैन्य ताकत और कूटनीतिक दृढ़ता को विश्व पटल पर स्थापित किया है, लेकिन कांग्रेस का ऐतिहासिक और वर्तमान रवैया राष्ट्रीय हितों के प्रति उनकी गैर-जिम्मेदाराना नीतियों को उजागर करता है। यह लेख गहन अनुसंधान और तथ्यों के आधार पर कांग्रेस की नीतिगत चूकों, वर्तमान भटकाव, और श्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह, और विदेश मंत्री श्री एस. जयशंकर के नेतृत्व में रक्षा और विदेश नीति में आए सकारात्मक बदलावों पर प्रकाश डालता है। इस लेख के माध्यम से  उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल के प्रति पक्षपात नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता के लिए एक निष्पक्ष, संकल्पित और तथ्यपरक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: कश्मीर और कांग्रेस की नीतिगत चूक
कश्मीर का मुद्दा भारत के लिए हमेशा से एक संवेदनशील और जटिल विषय रहा है। 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान ने कश्मीर के कुछ हिस्सों, जैसे पुंछ, उरी और गुरेज क्षेत्रों, पर अवैध कब्जा कर लिया। इसके बाद, 1962-64 के बीच भारत सरकार के तत्कालीन विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह और पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुई वार्ताओं में कांग्रेस सरकार की कमजोर नीतियां स्पष्ट होती हैं। इन वार्ताओं में, अंतरराष्ट्रीय दबाव, विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन के प्रभाव में, भारत ने न केवल पुंछ और उरी जैसे क्षेत्रों को पाकिस्तान को सौंपने पर विचार किया, बल्कि नीलम और किशनगंगा घाटी सहित लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) को अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता देने की दिशा में भी कदम उठाए। 

ऐतिहासिक दस्तावेजों का गहन अध्ययन बताता है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार, जिसका नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू और बाद में इंदिरा गांधी ने किया, ने अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता नहीं दी। इंदिरा गांधी, जिन्हें उनकी दृढ़ता के लिए "आयरन लेडी" कहा जाता है, ने 1971 के युद्ध में बांग्लादेश के निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, लेकिन कश्मीर के संदर्भ में उनकी सरकार की नीतियां उतनी प्रभावी नहीं थीं। शिमला समझौते (1972) में भारत ने अपनी मजबूत स्थिति का पूरा लाभ नहीं उठाया और कश्मीर मुद्दे को अनसुलझा छोड़ दिया। इन नीतिगत चूकों का परिणाम आज भी भारत के लिए सीमा पर तनाव और कश्मीर में अस्थिरता के रूप में सामने आता है। सवाल उठता है कि क्या यह केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव था, या कांग्रेस की नीतियों में राष्ट्रीय हितों के प्रति दूरदर्शिता की कमी थी?

ऑपरेशन सिंदूर: भारत की सैन्य और कूटनीतिक ताकत का प्रतीक
ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य और कूटनीतिक ताकत का एक शानदार उदाहरण है। हालांकि इस अभियान के विवरण गोपनीय हो सकते हैं, यह भारत की उस नीति को दर्शाता है जो आतंकवाद, सीमा उल्लंघन और बाहरी खतरों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की प्रतिबद्धता रखती है। सर्जिकल स्ट्राइक (2016), बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019) और अन्य गोपनीय अभियानों की तरह, ऑपरेशन सिंदूर भी भारत की सशस्त्र सेनाओं की ताकत, रणनीतिक कौशल और सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह अभियान न केवल भारत की सैन्य क्षमता को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि भारत अब अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।

मोदी, राजनाथ सिंह और जयशंकर के नेतृत्व में रक्षा और विदेश नीति में सकारात्मक बदलाव
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने रक्षा और विदेश नीति के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री श्री एस. जयशंकर की भूमिका इस दिशा में अहम रही है। इन नेताओं के संयुक्त प्रयासों ने भारत को एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है। निम्नलिखित बिंदु इन सकारात्मक बदलावों को रेखांकित करते हैं:

 रक्षा क्षेत्र में बदलाव (श्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में)
1. **आत्मनिर्भर भारत अभियान**: श्री राजनाथ सिंह ने रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को प्राथमिकता दी है। डीआरडीओ द्वारा विकसित तेजस लड़ाकू विमान, अर्जुन टैंक, आकाश मिसाइल सिस्टम और ब्रह्मोस मिसाइल जैसे स्वदेशी हथियारों का उत्पादन और निर्यात भारत की आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। हाल ही में, भारत ने 100 से अधिक रक्षा उपकरणों के आयात पर प्रतिबंध लगाकर स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा दिया है।
2. **सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास**: लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों, सुरंगों और हवाई पट्टियों का निर्माण तेजी से किया गया है। अटल टनल और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) रोड जैसे प्रोजेक्ट भारतीय सेना की तैनाती को और प्रभावी बनाते हैं।
3. **रक्षा सुधार**: रक्षा मंत्री के नेतृत्व में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की नियुक्ति और तीनों सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए थिएटर कमांड की स्थापना जैसे सुधारों ने भारत की सैन्य रणनीति को और मजबूत किया है।
4. **आधुनिक हथियारों का अधिग्रहण**: राफेल लड़ाकू विमान, एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और अपाचे हेलीकॉप्टर जैसे आधुनिक हथियारों के अधिग्रहण ने भारत की रक्षा क्षमता को कई गुना बढ़ाया है।

 विदेश नीति में बदलाव (श्री एस. जयशंकर के नेतृत्व में)
1. **कूटनीतिक दृढ़ता**: श्री एस. जयशंकर ने भारत की विदेश नीति को एक नई दिशा दी है। चाहे वह गलवान घाटी में चीन के साथ तनाव हो या पाकिस्तान के साथ कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखना, जयशंकर ने भारत की स्थिति को स्पष्ट और दृढ़ता से प्रस्तुत किया है।
2. **वैश्विक मंचों पर भारत की मजबूत उपस्थिति**: क्वाड (QUAD) और जी-20 जैसे मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका ने वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत को एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। जयशंकर की कूटनीति ने भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर अग्रणी बनाया है।
3. **पड़ोसी देशों के साथ संबंध**: ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत श्री जयशंकर ने दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को बढ़ाया है। मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ मजबूत संबंध और अफगानिस्तान में मानवीय सहायता भारत की कूटनीतिक सफलता को दर्शाते हैं।
4. **आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस**: जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ भारत के रुख को मजबूती से रखा है, जिसके परिणामस्वरूप मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया गया।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने रक्षा और विदेश नीति को एकजुट कर भारत को एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है। उनकी ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल ने रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया है, जबकि उनकी वैश्विक कूटनीति ने भारत को विश्व मंच पर एक विश्वसनीय और प्रभावशाली राष्ट्र बनाया है। गलवान जैसे संकटों में उनकी दृढ़ता और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे निर्णयों ने भारत की शक्ति को विश्व के सामने प्रदर्शित किया है।

कांग्रेस की वर्तमान बयानबाजी: राष्ट्रीय एकता पर सवाल
जब भारत रक्षा और विदेश नीति में ऐतिहासिक प्रगति कर रहा है, तब कांग्रेस पार्टी का रवैया चिंताजनक है। पार्टी के प्रवक्ता जयराम रमेश जैसे नेताओं के बयान, जो सेना की कार्रवाइयों और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं, न केवल सेना का मनोबल तोड़ने का प्रयास करते हैं, बल्कि देश की एकता और सुरक्षा को भी कमजोर करते हैं। उदाहरण के लिए, जयराम रमेश ने कई बार सरकार की रक्षा नीतियों और सैन्य कार्रवाइयों पर असंगत टिप्पणियां की हैं, जो राष्ट्रीय हितों के प्रति गैर-जिम्मेदाराना दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। 

दूसरी ओर, कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता जैसे शशि थरूर, सलमान खुर्शीद और गुलाम नबी आजाद राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर समय-समय पर देश का पक्ष रखते हैं। शशि थरूर ने अपने लेखों और भाषणों में भारत की कूटनीतिक ताकत को रेखांकित किया है, जबकि सलमान खुर्शीद ने विदेश नीति के संदर्भ में भारत के हितों की वकालत की है। गुलाम नबी आजाद ने कश्मीर में शांति और एकता पर जोर दिया है। लेकिन इन नेताओं के रुख के बावजूद, कांग्रेस का समग्र दृष्टिकोण एकजुटता की कमी को दर्शाता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चिंता का विषय है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर राजनीति से ऊपर उठने की आवश्यकता
राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा मुद्दा है जो किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा से ऊपर होना चाहिए। कांग्रेस का इतिहास—चाहे वह 1962 का भारत-चीन युद्ध हो, 1962-64 की स्वर्ण सिंह-भुट्टो वार्ताएं हों, या वर्तमान में सेना की कार्रवाइयों पर सवाल उठाना हो—राष्ट्रीय हितों के प्रति उनकी गैर-जिम्मेदाराना नीतियों को उजागर करता है। यह समय है कि सभी राजनीतिक दल, नेता और नागरिक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एकजुट हों। भारत की सेना और सरकार ने बार-बार यह साबित किया है कि वे देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। विपक्ष का दायित्व है कि वह रचनात्मक आलोचना करे और राष्ट्रीय हितों को मजबूत करने में योगदान दे, न कि ऐसी बयानबाजी करे जो देश के शत्रुओं को प्रोत्साहन दे।

युवाओं और आम जनता से अपील
भारत के युवा, जो देश का भविष्य हैं, और आम जनता, जो इस राष्ट्र की रीढ़ हैं, से मेरा आग्रह है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता के मुद्दों पर जागरूक रहें। कांग्रेस की ऐतिहासिक चूकों और वर्तमान भटकाने वाली राजनीति को समझें, लेकिन यह भी याद रखें कि राष्ट्रीय सुरक्षा किसी एक दल की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का साझा दायित्व है। हमें उन ताकतों का विरोध करना चाहिए जो भारत की एकता और संप्रभुता को कमजोर करने का प्रयास करती हैं, चाहे वे बाहरी शत्रु हों या आंतरिक राजनीतिक स्वार्थ। 

 निष्कर्ष: एकजुटता का संकल्प
ऑपरेशन सिंदूर और इसके जैसे अभियान भारत की सैन्य ताकत, कूटनीतिक दृढ़ता और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री श्री एस. जयशंकर के नेतृत्व में भारत ने रक्षा और विदेश नीति में ऐतिहासिक प्रगति की है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन, सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास, और वैश्विक मंचों पर भारत की मजबूत उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि भारत अब अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। इसके विपरीत, कांग्रेस की ऐतिहासिक चूक और वर्तमान भटकाने वाली राजनीति देश के लिए एक सबक है। 

राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति हमारा संकल्प दृढ़ होना चाहिए। यह मेरा विश्वास है कि भारत की एकता और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए हमें राजनीति से ऊपर उठकर देश के हितों को प्राथमिकता देनी होगी। आइए, हम सब मिलकर एक मजबूत, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में योगदान दें। 

**जय हिंद! जय भारत!**

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